आज रात्रि ने
आकाश पर काली चादर ओढ़ ली है।
चंद्रमा धुंधला है
मानो किसी रहस्य में लिपटा हुआ।
यह ग्रहण केवल छाया नहीं,
यह आत्मा की अंतर्यात्रा है।
नीला सागर
अपनी अनंत बाहें फैलाए
उस शीतल मुख की प्रतीक्षा में है।
लहरें थरथराती हैं
जैसे किसी अनदेखे स्पर्श से
हृदय की वीणा स्वयं बज उठे।
यह जल का कंपन नहीं,
यह प्रेम की गुप्त धड़कन है।
जब छाया चंद्रमा को ढँक लेती है,
तब सागर का हृदय और गहरा हो जाता है।
बाहर अंधकार, भीतर उजास।
जैसे प्रेमी की आँखें बंद हों,
पर अंतर्मन में सहस्र सूर्यों का प्रकाश जाग उठे।
रात्रि के मौन में
ऋषियों की वाणी तैरती है
तू लहर नहीं, तू स्वयं सागर है।
तू सीमित नहीं, तू वही अनंत चेतना है।
चंद्रमा दूर है,
फिर भी उसकी उपस्थिति
सागर को आंदोलित कर देती है।
ऐसे ही परमात्मा अदृश्य है,
पर उसकी आहट से
आत्मा में प्रेम की तरंगें उठती हैं।
ग्रहण की इस घड़ी में
चाँद स्वयं को खोता नहीं,
वह केवल छिपता है।
जैसे प्रेम कभी मरता नहीं,
वह बस अहंकार की छाया में
क्षण भर ढँक जाता है।
सागर की गहराइयों में
एक मौन तप रहा है— अथाह, असीम, अगाध।
जब चाँद की शीतल किरणें
उस तप पर गिरती हैं,
तो लहरें गीत बन जाती हैं।
वैसे ही
जब ध्यान की ठंडी श्वास
हृदय को छू लेती है,
तो भीतर का सागर
प्रेम-परमात्मा की एक ही धारा में बहने लगता है।
लहरें उठती हैं, टूटती हैं, मिटती हैं
पर सागर शाश्वत रहता है।
प्रेम आता है, बीत जाता है,
पर जो प्रेम के मूल में है,
वह अचल परमात्मा शाश्वत रहता है।
और एक क्षण ऐसा आता है, ग्रहण हट जाता है,
चंद्रमा फिर पूर्ण हो उठता है।
उसी क्षण लहर समझ लेती है,
मैं अलग नहीं।
मैं उसी गहराई की अभिव्यक्ति हूँ,
मैं सागर ही हूँ।
तब प्रेम साधना बन जाता है,
साधना समर्पण बन जाती है,
और समर्पण परमात्मा।
चंद्र-ग्रहण की इस मौन रात्रि में
सागर की गहराई, लहरों की थिरकन,
और चाँद की पुनः जन्मी आभा,
एक ही सत्य गूँजाती है,
प्रेम ही परमात्मा की छाया है,
और परमात्मा , प्रेम का अनंत सागर।
ग्रहण केवल आकाश में नहीं लगता,
वह मन पर भी उतरता है—
और जब भीतर का ग्रहण हट जाता है,
तब हर लहर में परमात्मा की झलक दिखाई देती है।
और यही झलक है प्रेम-परमात्मा की मौन साधना |