इस महान देश का एक छोर है – कन्याकुमारी, जहाँ मिलती है तीन जलराशिया हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी |
“पहली बाँदी” पश्चिम का अरब सागर — गहरा, गाढ़ा, स्थिर, कुछ रहस्यमय।
“दूसरी बाँदी” पूर्व की बंगाल की खाड़ी — हल्का, उग्र, भावनात्मक और तरल।
दोनों मिलती है, बीच में हिंद महासागर से – जेसे “एक साहिब”, “एक साक्षी”, जो दोनों को समेटे हुए है।
तीनों का रंग, तापमान, प्रवाह अलग-अलग है — और फिर भी वे एक ही बिंदु पर मिलकर एकता का अनुभव कराते हैं।
हिन्द महासागर सा “साहिब”
और उसमे समर्पित हो जाती “दो बांदिया ” – अरब सागर और बंगाल की खाड़ी,
दो भिन्न प्रवृत्तियाँ, दो स्वभाव, दो दिशाएँ।
यथार्थ में दोनों उसी एक अस्तित्व के अधीन हैं, उसी से उत्पन्न, उसी में विलीन।
लेकिन जब वे मिलते हैं, तो वह मिलन संघर्ष जैसा प्रतीत होता है — लहरों का टकराव, धाराओं की खींचतान।
वास्तव में वह संघर्ष नहीं, बल्कि संपूर्णता की साधना है।
भिन्नता के भीतर एकता का खेल। जो ना कभी अलग थी, न है और न ही होगी |
तीन दिशाओं से आती लहरें, तीन रंग, तीन स्वभाव — एक पश्चिम की गंभीर प्रार्थना, एक पूरब की नाचती पुकार, और बीच में खड़ा — मौन साहिब, हिंद महासागर — साक्षी।
अरब सागर — स्थिर, गंभीर, ध्यानमग्न, जैसे किसी योगी की निस्तब्ध आँखें। बंगाल की खाड़ी — चंचल, भावमयी, जैसे किसी भक्त का रोता हुआ हृदय। दोनों दौड़ती हैं साहिब की ओर, दोनों उसी के चरणों में समर्पित।
लहरों का टकराव दिखता है बाहर, पर भीतर केवल मिलन है — भिन्नता के स्वर में एक ही राग, उथल-पुथल में छिपा हुआ ध्यान।
कन्याकुमारी कहती है — “सागर नहीं लड़ते, वे लिपटते हैं; धाराएँ नहीं भिड़तीं, वे खोजती हैं अपने ही घर का मार्ग।”
एक साहिब, दो बाँदी— एक भक्ति-एक ज्ञान,एक शरीर – एक मन , एक राधा – एक रुकमणि , एक प्रेम – एक शुन्यता दोनों बहती हैं उसी ओर, जहाँ अंत नहीं, केवल शांति है।
जहा है केवल अंतिम चेतना , उनका साहिब , उनका परमात्मा , उनका कृष्णा