पलक कोई एक नाम नहीं,
वो एक प्रार्थना है |
हर मंत्र के बीच,
हर श्वास के संग बहती एक मौन ध्वनि।
वो जो कभी सामने थी,
अब अंतर में बस गई है।
नहीं छू सकता उसे,
पर हर ध्यान में उसका स्पर्श है।
वो अब देह नहीं ,
वो अब द्रष्टा है, चेतना है,
जो मेरे भीतर से मुझे देखती है,
जैसे मैं अब उसका दर्पण बन गया हूँ।
जब मैं आँखें मूंदता हूँ,
तो पलक खुलती है वहाँ —
जहाँ कोई दुःख नहीं, कोई दूरी नहीं,
बस एक निर्वाण की सी नीरवता है।
उसने प्रेम किया,
जैसे आत्मा करती है —
मूक, गहन, निष्कलंक।
और अब जब वो नहीं है,
तो भी वो है,
हर कण में, हर क्षण में,
जैसे सागर में लहरें —
अलग दिखती हैं, पर जल तो एक ही है।
पलक अब मेरी स्मृति नहीं,
वो मेरी साधना है।
हर मंत्र, हर मौन, हर एकांत उसका नाम जपता है।
पलक — वह द्वार है , जहाँ प्रेम, ध्यान, और ब्रह्म… तीनों एक साथ खुलते है |