|| राम को समझो, कृष्ण को जानो, नींद से जागो, ओ मस्तानों ||
भारत विरासतों का देश है, भारत का आकाश भरा हुआ है ब्रह्माण्ड के सबसे कीमती, सबसे अधिक मूल्यवान चमकते तारो और नक्षत्रो से | इन चमकते तारो और नक्षत्रो में सबसे कीमती स्थान रखते है राम और कृष्ण | भारत संभावनाओं का भी देश है, यहाँ की असीमित संभावनाए है यहाँ का आज का युवा | विरासतों के राम और कृष्ण, संभावनाओं के आज के युवा के साथ साधारण शब्दों में असाधारण गहराई समेटे हुए हैं।
राम को समझो, कृष्ण को जानो, नींद से जागो ओ मस्तानों – यह एक ऐसा वाक्य है, जो केवल भक्ति का आह्वान नहीं, बल्कि आत्म-जागरण के साथ साथ जीवन जीने की एक संपूर्ण यात्रा का संकेत देता है। यदि इसे भारत के सम्पूर्ण इतिहास, दर्शन, अध्यात्म, समाज और दार्शनिको के आलोक में देखा जाए, तो यह वाक्य जीवन के तीन आयामों—समझ, अनुभव और जागरण—को एक सूत्र में पिरोता है।
सबसे पहले – राम को समझो – की बात आती है। राम केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे त्याग, मर्यादा और संतुलन के प्रतीक हैं। राम केवल कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की व्यवस्था हैं, जो हमें मर्यादा का बोध कराते है | राम का जीवन सिखाता है — कैसे जिया जाए, कैसे हर परिस्थिति में संतुलित रहा जाए। उन्हें समझने का अर्थ है उनके जीवन के बाहरी घटनाक्रम से आगे बढ़कर उस आंतरिक अनुशासन को पहचानना, जो हर परिस्थिति में व्यक्ति को संतुलित बनाए रखता है। राम का जीवन यह सिखाता है कि कठिनाइयों और संघर्षों के बीच भी कैसे धैर्य, कर्तव्य और नैतिकता को बनाए रखा जाए। राम को समझो – वास्तव में अपने भीतर की व्यवस्था,त्याग, मर्यादा और सजगता को पहचानने का निमंत्रण है।
इसके बाद – कृष्ण को जानो – का सूत्र आता है, कृष्ण का व्यक्तित्व बहुआयामी और पूर्णता से भरा हुआ है। वे जीवन को केवल नियमों में बाँधने की बात नहीं करते, बल्कि उसे एक उत्सव, एक लीला के रूप में जीने की प्रेरणा देते हैं।गीता में कृष्ण अर्जुन को यह शिक्षा देते हैं कि व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना चाहिए, किंतु उसके फल के प्रति आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। कृष्ण जीवन की उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ व्यक्ति पूरी स्वतंत्रता, सहजता और आनंद के साथ जीता है। इसलिए कृष्ण को जानो – का अर्थ है अपने भीतर उस चेतना को अनुभव करना, जो बंधनों से मुक्त है, जो जीवन को खेल की तरह स्वीकार करती है और हर क्षण में आनंद खोज लेती है।
नींद से जागो, ओ मस्तानों – की पुकार इस पूरे चिंतन का केंद्रबिंदु है। यह जागरण बाहरी नींद से नहीं, बल्कि भीतर की अचेतन अवस्था से जागने का आह्वान है। कहा गया है— उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति – अर्थात उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त करके ज्ञान को समझो। यह मार्ग अत्यंत कठिन है, जैसे चाकू की धार पर चलना, इसलिए बुद्धिमान लोग इसे दुर्गम बताते हैं। जागरण का सही अर्थ है – अचेतनता से बाहर निकलना और अपने भीतर के चेतन्य को पहचानना—वह चेतना जो सब कुछ देखती है, परंतु किसी में उलझती नहीं।
विरासतों के राम और कृष्ण, संभावनाओं के आज के युवाओ के साथ साधारण शब्दों में असाधारण गहराई समेटे हुए हैं जो सम्पूर्णता में बस इतना ही गहरा अर्थ रखती है – राम को समझो – राम अर्थात अनुशासन (discipline), जीवन को संतुलित करो और अपने भीतर संतुलन, मर्यादा और जागरूक कर्म को पहचानो। कृष्ण को जानो – कृष्ण अर्थात स्वतंत्रता (freedom) और पूर्णता (totality), जीवन को पूर्णता से जियो और अपने भीतर की मुक्तता, आनंद और पूर्णत्व को अनुभव करो। स्वभाव के अनुसार जीओ, आसक्ति छोड़ो | नींद से जागो – अर्थात अपने असली स्वरूप को पहचानो |
राम हमें अनुशासन और संतुलन सिखाते हैं, कृष्ण हमें स्वतंत्रता और आनंद का अनुभव कराते हैं, और दोनों ही हमें जागरण की दिशा में प्रेरित करते हैं। जब जीवन में अनुशासन और स्वतंत्रता का संतुलन स्थापित हो जाता है, तभी सच्चा जागरण संभव होता है | अंततः, यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल जीना नहीं, बल्कि जागकर जीना है—समझ के साथ, अनुभव के साथ और पूर्ण सजगता के साथ।
अंतत : राम को समझो, कृष्ण को जानो, नींद से जागो ओ मस्तानों का बस इतना ही सार है –