प्रेम, खीर और परमात्मा — एक सूक्ष्म अनुभव
भारत के पुराने साहित्य में एक कहानी का उल्लेख है | राह चलते किसी सन्यासी को गाँव के किसी परिवार अपने घर बुलाकर भोजन के रूप में खीर खिलाई |
सुनने में यह एक बहुत साधारण सी घटना लगती है। लेकिन यदि इसे गहराई से देखा जाए, तो यह केवल भोजन का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि हृदय की सबसे मधुर अभिव्यक्ति है।
जब कोई व्यक्ति प्रेम से किसी को भोजन खिलाता है, तो वह सिर्फ अन्न नहीं देता, बल्कि अपने भीतर की मिठास, करुणा और अपनापन परोसता है। उस क्षण में यह साधारण भोजन नहीं रह जाता — वह प्रसाद बन जाता है।
भारतीय दर्शन में कहा गया है — “अन्नं ब्रह्म” अर्थात अन्न स्वयं ब्रह्म है।
परंतु यह सत्य तब और गहरा हो जाता है, जब अन्न प्रेम से दिया जाए। क्योंकि जहां प्रेम होता है, वहां परमात्मा स्वतः प्रकट हो जाता है।
प्रेम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें देने वाला और पाने वाला दोनों धीरे-धीरे मिट जाते हैं। वहां कोई अहंकार नहीं रहता, कोई अपेक्षा नहीं रहती — केवल एक ऊर्जा बचती है, और वह ऊर्जा है प्रेम की। यही प्रेम, परमात्मा का सबसे शुद्ध रूप है।
जब भोजन प्रेम से खिलाया जाता है, तो वह केवल शरीर का पोषण नहीं करता, बल्कि आत्मा को भी स्पर्श करता है। वह एक ऐसा अनुभव बन जाता है, जिसमें शब्दों की आवश्यकता नहीं होती — केवल भाव ही पर्याप्त होते हैं।
इस दृष्टि से देखा जाए तो खीर खिलाना एक छोटी घटना नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रिया है। यह हमें सिखाती है कि परमात्मा को खोजने के लिए किसी जटिल साधना की आवश्यकता नहीं है।
जहां सच्चा प्रेम है, निस्वार्थ भाव है, वहीं परमात्मा का वास है। अंततः, इस प्राचीन कहानी में यह कहना अधिक सत्य होगा कि —
खीर नहीं खिलाई गई, बल्कि प्रेम परोसा गया,
और जहां प्रेम परोसा जाता है, वहीं परमात्मा स्वयं उपस्थित हो जाता है।
उस क्षण में शब्द भी शांत हो जाते हैं,
मन की सारी तरंगें शून्य में विलीन हो जाती हैं।
न कोई देने वाला रहता है, न कोई पाने वाला —
बस एक मौन, एक शून्यता बचती है।
और उसी शून्यता में,
परमात्मा स्वयं प्रकट होता है।