Doctor`s talk दशमूलारिष्ट – आयुर्वेद का अनुपम टॉनिक

May 1, 2026by Tatva Krishna

दशमूलारिष्ट – आयुर्वेद का अनुपम टॉनिक

पर्णों बहुल्यो गोक्षुरो बिल्वादिसम्युतो रसः ।
पाटला काश्मरी चैव दशमूलमिहोच्यते ।।
दशमूलानि कुर्वीत भागाः पञ्चपले पृथक् ।
पञ्चविंशत्पलं कुष्ठं च पौष्करं तथा ।।
कुष्ठपञ्चपलं लोढ्रं गुडूची तत्समा भवेत् ।
पले पौष्करमीरविसंख्याद्रालभा ।।
खादिरो गोजिह्वा स्रष्टा पथ्या चैव पृथक्पले ।
अश्वगन्धा गुडूची कुष्ठ मञ्जिष्ठा देवदारु च ।।
विदंग मधुक भार्गी कपीकच्छु पुनर्नवा ।
चव्य मासी प्रियंगुश्च सारिवा कुष्णजीरकम् ।।
त्रिवृता रेणुका रास्ना पिप्पली क्रमुकः शटी ।
हरिद्रा शतपुष्पा च पद्मक नागकेशरम् ।।
मुस्तमिन्द्रयवः शुण्ठी जीवक ऋषभकौ तथा ।
मेदा च महामेदा काकोली ऋद्धिवृद्धिके ।।
कृततुल्यं दीपनीयं पचेत्सघने जले ।
चतुर्थशेषं नीत्वा मूलादे सर्वमाप्यते ।।
ततः पृथक्पलं द्राक्षां पचेत्सर्वे चतुर्गुणे ।
त्रिपादशेषे शीतस्त्र पूर्ववत् भाण्डे स्थापयेत् ।।
धात्रीशर्करालिङ्ग क्षौद्र दध्ना गुडयुतं शतम् ।
त्रिशतालानि धातव्याः कक्कोलजलबन्धनम् ।।
जातिफल लवंग च त्वक्पत्रकेशरम् ।
पिप्पली चूर्णयुक्तं भागार्थ पञ्चपले पृथक् ।।
शाणमात्रं कस्तूरी सर्वमेव निवेशयेत् ।
भूमौ निधाय भाण्डे ततः जातरसं पिबेत् ।।
कतकस्य फल क्षिप्त्वा रसं निर्मलतां नयेत् ।
ग्रहणीमर्शशूल ध्वंसकारसमुद्भवम् ।।
वातव्याधि क्षय छर्दि पाण्डुरोग कमलाम् ।
कृच्छ्राश्मरी मेहांश्च मन्दाग्निमुदराणि च ।।
शर्करामर्शं मूत्रकृच्छ धातुक्षयं जयेत् ।
कृशानां पुष्टिजननं बन्धानां पुत्रदं परम् ।।

 घटक द्रव्य –  चित्रक की जड़ की छाल तथा पौष्करमूल,
पथानी लोथ तथा गिलोय , आँवले ,
जवासा , खैर की छाल अथवा कत्था,
बीजसार, वायविडंग, गुडूची रहित बड़ी हरड़ 
एवं कुष्ठ, मंजिष्ठा, देवदारु, वायविडंग, मुलेठी, भार्गी,
कपीकच्छ, पुनर्नवा की जड़, चव्य, जटामांसी,
प्रियंगु, सालिवा, काला जीरा, निशोथ, रेनुका, रास्ना,
पिप्पली, सुपारी, कचूर, हरिद्रा, सौंफ, पद्मकाठ, नागकेशर,
नागरमोथा, इन्द्रजव, काकड़ासिंगी, जीवक, ऋषभक,
मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, वृद्धि
 मनुका, शहद, गुड ।

दशमूलारिष्ट के लाभ

यह दशमूलारिष्ट संग्रहणी, अरुचि, शूल, श्वास, कास,
भगंदर, वातव्याधि, क्षय, वमन, पाण्डु, कामला आदि रोगों में उपयोगी है।
यह अग्नि को बढ़ाता है, धातुओं को पुष्ट करता है
तथा शरीर को बल और वीर्य प्रदान करता है।श्वास, कास में लाभकारी
अग्नि दीपक एवं पाचन में सहायक
वातव्याधि एवं जोड़ों के दर्द में उपयोगी
प्रतिकार शक्ति बढ़ाए
पाण्डुरोग एवं क्षय में लाभकारी
यकृत (लिवर) स्वास्थ्य के लिए उपयोगी
बल, वीर्य और ऊर्जा बढ़ाए

💊 सेवन विधि (सामान्य)

10–20 ml (2–4 चम्मच) भोजन के बाद समान मात्रा में जल के साथ
या चिकित्सक के परामर्श अनुसार।

⚠️ सावधानियाँ

गर्भवती महिलाएं एवं गंभीर रोगी चिकित्सक से परामर्श लेकर सेवन करें।