प्रेम, परमात्मा और अस्तित्व
परमात्मा ही अस्तित्व है,
और हर जीव का परम कर्तव्य है
अपने उसी अस्तित्व को खोजना,
उसे पहचानना,
और अंततः उसी में विलीन हो जाना ।
अस्तित्व ही प्रेम है,
प्रेम ही परमात्मा है,
और परमात्मा ही सम्पूर्ण अस्तित्व।
इस सृष्टि में हर प्राणी अद्वितीय है।
न कोई किसी की प्रतिलिपि है,
न कोई किसी से महान।
सबका अपना स्वर है,
अपनी धड़कन,
अपनी यात्रा।
सबमें प्रेम है,और
हर हृदय में मौन सा बसता है परमात्मा।
इसलिए बस जियो…
बसो…और
बहो नदी की तरह…
और एक दिन उसी अस्तित्व में मिल जाओ
जैसे सभी नदियाँ
सागर में समा जाती हैं।
कोई भी अनुयायी
सिर्फ अनुयायी बनकर
कभी बुद्ध या कृष्ण नहीं बन पाया।
और सच तो यह है—
बुद्ध या कृष्ण बनने की आवश्यकता भी क्या है?
अस्तित्व ने तुम्हें
पहले ही बहुत विशेष बनाया है।
तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं।
फिर भला
उधार का चेहरा ओढ़कर,
उधार का ज्ञान लेकर,
उधार का प्रकाश लेकर क्या पाओगे?
उधार के वस्त्र कभी अपने नहीं होते।
उधार का ज्ञान
आत्मा को प्रकाशित नहीं करता।
ज़रा अपने भीतर उतरकर तो देखो।
अपने मौन को सुनो।
अपने बोध को जगाओ।
अपने अस्तित्व को पहचानो।
अपने भीतर स्वयं प्रकाश पैदा करो।
तुम बनो
अपने ही बुद्ध, अपने ही कृष्ण।
एक दिन पूछा पलक से कृष्ण ने —
“तुम्हारे बिना मेरा क्या अस्तित्व?”
वह मुस्कुराई
और बड़े प्रेम से बोली—
“भला कृष्ण का भी
कोई दूसरा अस्तित्व होता है क्या?
कृष्ण तो स्वयं ही अस्तित्व हैं सबके,
कृष्ण तो निरा परमात्मा हैं,
और उस परमात्मा में “पलक” है प्रेम…”
वही प्रेम
जो मौन होकर भी
सबके भीतर थिरकता रहता है।
यदि कभी मैं न रहूँ,
तो मुझे ढूँढ़ना मत—
बस महसूस कर लेना
हर हृदय में प्रेम बनकर।
मैं मिलूँगी तुम्हें
किसी मोड़ पर,
किसी की आँखों की नमी में,
किसी के मन के मौन में।