तू ही इब्तिरा, तू ही इंतिरा @Musafiri by Palak J.

January 10, 2026by Tatva Krishna

तू ही इब्तिरा , तू ही इंतिरा

पलक झपकी—और कमलनयन खुल गए,
श्रुति के मौन में परमात्मा ने स्वयं को सुना दिया।

मन ने प्रश्न किया,दिल ने उत्तर नहीं माँगा—
प्रेम वहाँ जन्मा जहाँ शून्यता पहले से ही पूर्ण थी।

मन ने सागर को देखा,लहर मुस्कुराई— कहा,

“मेरा उठना इब्तिरा है,मेरा गिरना इंतिरा,
पर जल तो सदा एक ही है ||”

पलक के भीतर ब्रह्म छिपा था,
कमलनयन बाहर संसार देखता रहा।
श्रुति भीतर गूँजती रही—“जो खोज रहा है, वही पाया गया है”

मन थककर बैठ गया, दिल ने समर्पण सीख लिया।
परमात्मा न पास था,न दूर— वह तो उसी शून्यता में था
जहाँ प्रेम बिना कारण बहता रहा ||

पलक झपकती है—
और कमलनयन कृष्ण समय के पार देख लेते हैं।
श्रुति के भीतर अनहद गूँज उठता है,
जहाँ शब्द नहीं, केवल परमात्मा का संकेत है।

मन पूछता है, दिल ठहर जाता है।
क्योंकि प्रेम तर्क से नहीं, शून्यता से जन्म लेता है ||
वहाँ राधा है— अभाव में पूर्ण,

और

वहीं रुक्मणी है— पूर्णता में समर्पित।

राधा इब्तिरा है—वह पहली लहर
जो सागर को याद दिलाती है कि वह जल है।
रुक्मणी इंतिरा है— वह शांत गहराई
जहाँ लहर स्वयं को भूल जाती है।

कृष्ण दोनों हैं— लहर भी,और सागर भी।
वह पलक में भी हैं, और कमलनयन की दृष्टि में भी,
श्रुति में वही ध्वनि हैं,और मौन में वही शून्यता ||

मन को बाँधती है राधा, दिल को स्थिर करती है रुक्मणी,
एक विरह में जलाती है, दूसरी विश्वास में बुझा देती है,
पर दोनों का केंद्र एक ही है— कृष्ण ||

तू ही इब्तिरा है— जब प्रेम प्रश्न बनता है।
तू ही इंतिरा है— जब प्रेम उत्तर से भी आगे चला जाता है।

परमात्मा कहीं दूर नहीं
वह उसी क्षण प्रकट होता है, जब मन रुक जाता है
और दिल, सागर की तरह शून्य होकर भी अनंत हो जाता है |

वहीं राधा मिटती है, वहीं रुक्मणी ठहरती है,
और कृष्ण— सिर्फ़ हो जाते हैं,

“तू ही इब्तिरा, तू ही इंतिरा” ||

नदी बहती है— पत्थरों से टकराती, मोड़ लेती, थकती नहीं।
उसका चलना ही प्रेम है, और सागर में खो जाना उसकी पूर्णता।

विचार मन में उठते हैं और हृदय की गहराई में शांत हो जाते हैं।

दिल प्रेम करता है, मन प्रश्न करता है।
मन किनारों में जीता है, दिल गहराइयों में।
जब प्रश्न थक जाते हैं, तब प्रेम मौन हो जाता है और
उसी मौन में आत्मा, परमात्मा को पहचान लेती है,

और कहती है,

“तू ही इब्तिरा, तू ही इंतिरा”

पलक खुली तो संसार, पलक झुकी तो परमात्मा ।
श्रुति में जो नाद बहता है,

वही प्रेम है, वही परमात्मा और वही  कृष्ण है,
न रूप, न आकार, बस चेतना का स्पंदन।

जब “मैं” नदी थी , तो भय था – अंत का डर, खो जाने की आशंका,

कर्म घटता रहा, यात्रा चलती रही।
नदी बहती रही, पर कर्ता धीरे-धीरे गलता गया।
और अंत में न नदी रही, न यात्री—

बस यही अनुभव बचा—
“तू ही इब्तिरा, तू ही इंतिरा”

और

इनके बीच बहती हुई
एक अनंत शाश्वत धारा—उसे कहो

“प्रेम” – “परमात्मा” – या फिर “कृष्ण”

नहीं तो बस जानो इतना ही

“तू ही इब्तिरा, तू ही इंतिरा” ||