|| अमृत था, अमृत है , और, अमृत रहेगा ||
मैं वहाँ नहीं मिलता,
जहाँ ढूँढ रहे हो तुम मुझे,
मैं मिलता हूँ,
नदियों की गहराई में,
समन्दरों की लहरों में,
पहाड़ों के पत्थरों में,
ऊंचाई से गिरते झरनों की आवाज़ में,
पक्षियों की चहचहाहट में,
प्रकृति के सोंदर्य में,
मन के विश्वास में,
जानवरों की करुणा में,
पेड़ – पौधों की जीवन में,
माँ की ममता में,
बहन के प्यार में,
आत्मा के अकर्मण्य भाव में,
समय की परिधी में,
ब्रह्मांड के मोंन में,
वासनाओ के अन्त में,
सोभाग्य के शिखर में,
क्योंकि सत्य हूँ मैं,
अमृत हूँ मैं।|
मैं नहीं मिलता वहाँ,
जहाँ,
ढून्ढ रहे हो तुम मुझे ,
क्योंकि संसार नहीं हूँ मैं।
अदृश्य हूँ मैं,
प्रेम हूँ मैं,
शून्यता हूँ में
विश्वास हूँ मैं,
अमरत्व हूँ में,
संसार से परे हूँ मैं,
भाव हूँ में,
तुम मुझे ढूँढ रहे हो बाहर,
मैं समाया हूँ तुम्हारे ही भीतर,
क्योंकि सत्य हूँ मैं,
अमृत हूँ मैं।|
तुम मुझे नहीं मार सकते,
मुझे मारने के लिए,
खोना होगा स्वयं को तुम्हें,
जो तुम्हारे बस की बात नहीं ,
जिस दिन खो दोगे स्वयं को तुम,
उस दिन मिल जाऊँगा मैं तुम्हे,
हो जाओगे मुझमे ही तुम समाहित ,
न रहेगा तुम्हारा अस्तित्व,
न कोई नाम शेष रह जाएगा,
ना रहेगा तुम्हारा कोई वजूद,
ना ही कोई भ्रम रह जायेगा,
तुम बून्द हो अमृत की,
मे स्वयम अमृत हूँ ||